परस्तस्मात्तु भावोऽन्योऽव्यक्तोऽव्यक्तात्सनातनः। यः स सर्वेषु भूतेषु नश्यत्सु न विनश्यति॥20॥
Translation (HI)
उस अव्यक्त के परे भी एक और सनातन अव्यक्त भाव है — जो समस्त प्राणियों के नाश होने पर भी नष्ट नहीं होता।
Life Lesson (HI)
ईश्वर से परे कुछ नहीं — वे सभी के अंत में भी अविनाशी हैं।
Commentary (HI)
इस श्लोक में भगवान के सर्वव्यापक स्वरूप का वर्णन किया गया है। यहाँ उस अव्यक्त और सनातन भाव का उल्लेख है जो समस्त प्राणियों के नाश होने पर भी नष्ट नहीं होता। इसका अर्थ है कि भगवान ईश्वर से भी परे हैं, और उनमें उच्चतम और अविनाशी स्वरूप है। भगवान की यह अद्वितीयता और अविनाशिता का विचार हमें समझाता है कि उनका साकार और निराकार स्वरूप सभी प्राणियों के अंतर्गत स्थित है और उनका विनाश नहीं हो सकता। इसका यह मतलब है कि हमें ईश्वर के साथ अनन्य भक्ति में लगना चाहिए और उन्हीं की शरण में जाकर अमरता को प्राप्त करना चाहिए।