हे पार्थ! जो अभ्यासयुक्त और एकनिष्ठ चित्त से उस परम पुरुष का निरंतर चिंतन करता है, वह उसे प्राप्त करता है।
Life Lesson (HI)
निरंतर अभ्यास और चिंतन से परमात्मा की प्राप्ति होती है।
Commentary (HI)
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कह रहे हैं कि जो व्यक्ति निरंतर अभ्यास और ध्यान से परम आत्मा का स्मरण करता है, वह उस परम पुरुष को प्राप्त करता है। इस श्लोक में 'अभ्यासयोगयुक्तेन' का अर्थ है निरंतर अभ्यास और साधना से युक्त होना। 'चेतसा नान्यगामिना' अर्थात एकाग्र चित्त से, अन्य किसी गतिविधि में नहीं लगा हुआ। 'परमं पुरुषं दिव्यं' का अर्थ है परम आत्मा जो दिव्य है और अद्वितीय है। 'याति पार्थानुचिन्तयन्' अर्थात अनुचित को विचारने वाला, ध्यान करने वाला।
श्रीकृष्ण यहाँ सारांश स्वरूप से बता रहे हैं कि निरंतर अभ्यास और आत्मा के साथ सम्बन्ध बनाए रखने से ही आत्मा की प्राप्ति होती है। यह श्लोक हमें यह शिक्षा देता है कि ध्यान और अभ्यास से हम अपने आत्मा को पहचान सकते हैं और परमात्मा को प्राप्त कर सकते हैं। इसके लिए एकाग्र चित्त से उस परम पुरुष का निरंतर स्मरण करना महत्वपूर्ण है। इस प्रकार, यह श्लोक हमें आत्मा की खोज में लगे रह