समोऽहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योऽस्ति न प्रियः। ये भजन्ति तु मां भक्त्या मयि ते तेषु चाप्यहम्॥29॥
Translation (HI)
मैं सभी प्राणियों में समभाव रखता हूँ — न कोई मुझे अप्रिय है, न प्रिय; लेकिन जो भक्त मुझे प्रेमपूर्वक भजते हैं, वे मुझमें हैं और मैं उनमें।
Life Lesson (HI)
ईश्वर निष्पक्ष हैं, लेकिन भक्ति उन्हें बांध लेती है।
Commentary (HI)
इस श्लोक में भगवान कृष्ण अपने महान विश्वरूप का वर्णन कर रहे हैं। उन्होंने कहा है कि वे सभी प्राणियों में समान भाव रखते हैं, उन्हें न तो कोई अप्रिय है और न ही प्रिय। लेकिन जो व्यक्ति भगवान को प्रेम से भजता है, उसका उनसे विशेष संबंध होता है। भगवान कृष्ण उस भक्त के मन में वास करते हैं और उसके साथ हमेशा रहते हैं।
इस श्लोक से हमें यह सिखाई जाती है कि भगवान सबके प्रति निष्पक्ष हैं, लेकिन उन्हें भक्ति से प्राप्त किया जा सकता है। भक्ति के माध्यम से हम ईश्वर के साथ एकता और समर्पण की भावना विकसित कर सकते हैं और उसके साथ एक में मिल सकते हैं। इस श्लोक से हमें यह भी समझ मिलता है कि भक्ति का मार्ग एकमात्र उपाय है जिससे हम ईश्वर के पास पहुँच सकते हैं।