क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्वच्छान्तिं निगच्छति। कौन्तेय प्रतिजानीहि न मे भक्तः प्रणश्यति॥31॥
Translation (HI)
वह शीघ्र ही धर्मात्मा बन जाता है और चिरकालिक शांति को प्राप्त करता है। हे कौन्तेय! यह मेरी प्रतिज्ञा है कि मेरा भक्त कभी नाश को प्राप्त नहीं होता।
Life Lesson (HI)
ईश्वर अपने भक्तों की रक्षा सदैव करते हैं।
Commentary (HI)
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कह रहे हैं कि जो व्यक्ति शीघ्र ही धर्मात्मा बन जाता है, वह चिरकालिक शांति को प्राप्त करता है। अर्थात् जो व्यक्ति धर्म का पालन करते हुए जीवन जीता है, वह शांति को हासिल करता है। भगवान कहते हैं कि वह अपने भक्तों की संरक्षा सदैव करते हैं और उनके भक्त कभी नाश को प्राप्त नहीं होता। इसका अर्थ है कि जो व्यक्ति भगवान का भक्त बन जाता है, उसे भगवान की कृपा सदैव मिलती रहती है और वह कभी भी नाश को नहीं पाता।
इस श्लोक से हमें यह सिखाई जाती है कि धर्मात्मा बनने के लिए हमें अपने कर्मों का उचित निष्काम फल और ईश्वर की भक्ति में लगना आवश्यक है। भगवान हमें सदैव संरक्षित रखते हैं अगर हम उनके भक्त बनते हैं और उनके मार्ग पर चलते हैं।