मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना। मत्स्थानि सर्वभूतानि न चाहं तेष्ववस्थितः॥4॥
Translation (HI)
मेरी अव्यक्त मूर्ति से यह संपूर्ण जगत व्याप्त है। समस्त प्राणी मुझमें स्थित हैं, परंतु मैं उनमें नहीं हूँ।
Life Lesson (HI)
ईश्वर सर्वव्यापक हैं फिर भी अप्रत्यक्ष रहते हैं।
Commentary (HI)
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अपने दिव्य स्वरूप का वर्णन कर रहे हैं। उन्होंने कहा है कि जगत का सम्पूर्ण भूत ही उनकी अव्यक्त मूर्ति में व्याप्त है। यानी सभी जीव में उन्हीं की स्थिति है, लेकिन उनका स्वरूप दृश्यमान नहीं है। भगवान कहते हैं कि वे सबके अंतर्यामी हैं, सबका आधार हैं, परन्तु वे स्वयं भिन्न और अप्रत्यक्ष रहते हैं।
इस श्लोक से हमें यह समझने को मिलता है कि भगवान की अद्वितीयता और अपरिच्छिन्नता को समझना हमारे जीवन में विश्वास और श्रद्धा का विकास करता है। हमें यह भी याद रखना चाहिए कि भगवान सबका संरक्षक हैं, उनकी अव्यक्त स्वरूप को समझकर हमे उनके प्रति भक्ति और समर्पण बढ़ाना चाहिए।