न काङ्क्षे विजयं कृष्ण न च राज्यं सुखानि च। किं नो राज्येन गोविन्द किं भोगैर्जीवितेन वा॥32॥
Translation (HI)
हे गोविंद! न मुझे विजय चाहिए, न राज्य और न ही सुख। इनका लाभ क्या जब अपने ही नहीं रहें।
Life Lesson (HI)
जीवन की सच्ची संपत्ति संबंध होते हैं, न कि सत्ता।
Commentary (HI)
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कह रहे हैं कि उन्हें विजय, राज्य और सुख की इच्छा नहीं है। वे यह प्रकट कर रहे हैं कि इन मानोवंचित वस्तुओं का लाभ होता है जब वे अपने ही नहीं रहते।
यह श्लोक हमें यह सिखाता है कि जीवन की सच्ची समृद्धि और सुख संबंधों, प्रेम और सेवा में है, न कि शक्ति और सत्ता में। असली सुख और समृद्धि उस समय मिलती है जब हम दूसरों के साथ संबंधों में निवेश करते हैं और उनकी मदद करते हैं। इसलिए, हमें अपने कर्तव्यों के प्रति समर्पित रहना चाहिए और अपने स्वार्थ की भावनाओं से परे जानना चाहिए।
इस भावार्थ से यह श्लोक हमें यह बताता है कि सच्चा सुख और समृद्धि प्रेम और सेवा में है, और हमें इसे समझकर अपने जीवन में उतारना चाहिए।