Bhagavad Gita • Chapter 1 • Verse 45

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Chapter 1 • Verse 45

Arjuna Vishada Yoga

अहो बत महत्पापं कर्तुं व्यवसिता वयम्। यद्राज्यसुखलोभेन हन्तुं स्वजनमुद्यताः॥45॥
Translation (HI)
हाय! हम बहुत बड़ा पाप करने को तैयार हो गए हैं—सिर्फ राज्य और सुख के लोभ में अपने ही लोगों को मारने के लिए।
Life Lesson (HI)
लोभ और मोह कभी-कभी हमें अपने ही विरुद्ध खड़ा कर देते हैं।
Commentary (HI)
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कह रहे हैं कि वे अपने दुश्मनों को मारने के लिए तैयार हो गए हैं, बस इसलिए कि उन्हें राज्य और सुख की लालसा ने उनका वश में कर दिया है। इस श्लोक में दिखाया गया पाप उनकी अवस्था की विवादितता को प्रकट करता है। इस श्लोक का मुख्य संदेश है कि लोभ और मोह व्यक्ति को अपने धर्म से भटका सकते हैं और उसे दुर्बल बना सकते हैं। इसका अर्थ है कि हमें अपने प्रियजनों के हित में नहीं बल्कि अपने धर्म और कर्तव्य के प्रति निष्ठा रखनी चाहिए। अगर हम लोभ और मोह में अपनी बुद्धि खो देते हैं, तो हम अपने कर्तव्यों को भूल जाते हैं और पाप करने को तैयार हो जाते हैं। इस श्लोक से हमें यह सिखाई जाती है कि हमें लोभ और मोह से परहेज करना चाहिए और हमें हमेशा अपने कर्तव्यों के प्रति सचेत रहना चाहिए। इससे हम अपने वास्तविक स्वभाव को समझते हैं और सही और उचित कार्यों का चयन करने में सक्षम होते हैं।