सर्वमेतदृतं मन्ये यन्मां वदसि केशव। न हि ते भगवन्ब्यक्तिं विदुर्देवा न दानवाः॥14॥
Translation (HI)
हे केशव! जो कुछ भी आप मुझसे कह रहे हैं, उसे मैं सत्य मानता हूँ। हे भगवान! आपकी वास्तविकता को न तो देवगण और न ही दानव जानते हैं।
Life Lesson (HI)
परम सत्य स्वयं को प्रकट करता है — उसे कोई जान नहीं सकता।
Commentary (HI)
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अपने साक्षात्कार से भगवत्ता को समझाने की बात कर रहे हैं। वे यह कह रहे हैं कि जितना उन्होंने अर्जुन को बताया है, वह सच है और उन्हें यह मानना चाहिए। उनकी वास्तविकता को न तो देवताओं और न ही राक्षसों ने जाना है।
इस श्लोक का महत्व साक्षात्कार की महत्वपूर्णता पर है। भगवान श्रीकृष्ण का यह कथन हमें यह बताता है कि परम सत्य को समझने के लिए हमें स्वयं का अनुभव करना होगा, और यह सत्य हमें स्वयं ही समझना होगा। इसका भावार्थ है कि व्यक्तिगत अनुभव और साक्षात्कार ही हमें आत्मा की वास्तविक स्वरूप को समझने में सहायक होते हैं।
इस श्लोक से हमें यह शिक्षा मिलती है कि आत्मा की सच्चाई को समझने के लिए हमें अपने अंतर्मन की शुद्धि और साक्षात्कार की दिशा में प्रयास करना चाहिए। इससे हम भगवान की वास्तविकता को समझ सकते हैं और उसके अनुसार जीवन जी सकते हैं।