रुद्रों में मैं शंकर हूँ, यक्षों-राक्षसों में कुबेर, वसुओं में अग्नि और पर्वतों में मेरु हूँ।
Life Lesson (HI)
सर्वोच्चता और गरिमा में ईश्वर की झलक होती है।
Commentary (HI)
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अपने दिव्य स्वरूप का वर्णन करते हुए कहते हैं कि उन्होंने अनेक देवताओं और शक्तियों में अपना स्वरूप प्रकट किया है। उन्होंने कहा है कि रुद्राणां में वह भगवान शंकर हैं, जो विनाशकारक और सृष्टिकर्ता हैं। वित्तेशो में वह कुबेर हैं, जो धन के स्रोत के स्वामी हैं। वसूनां में वह पावक, अग्नि हैं जो पवित्रता और ऊर्जा का प्रतीक हैं। मेरुः शिखरिणां में उन्होंने कहा है कि वह मेरु पर्वत के समान स्थिर और उच्चता स्वरूप हैं।
इस श्लोक से हमें यह सिखाई जाती है कि भगवान का स्वरूप अत्यंत महान और अद्वितीय है। उनकी उपस्थिति हर वस्तु में भावनात्मक और शक्तिशाली है। इसका अर्थ है कि हर व्यक्ति, हर देवता और हर वस्तु में भगवान की अद्वितीयता की प्रतिभास होती है। इस श्लोक से हमें यह भी समझ मिलता है कि संसार में सभी वस्तुओं और प्राणियों में भगवान की अनन्तता और उच्चता का अनुभव होता है।