Bhagavad Gita • Chapter 10 • Verse 24

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Chapter 10 • Verse 24

Vibhuti Yoga

पुरोधसां च मुख्यं मां विद्धि पार्थ बृहस्पतिम्। सेनानीनामहं स्कन्दः सरसामस्मि सागरः॥24॥
Translation (HI)
हे पार्थ! पुरोहितों में बृहस्पति को, सेनानियों में स्कन्द (कार्तिकेय) को और जलाशयों में समुद्र को जानो — वह मैं हूँ।
Life Lesson (HI)
नेतृत्व और व्यापकता में भी ईश्वर का वास होता है।
Commentary (HI)
इस श्लोक में भगवान कृष्ण अर्जुन से कह रहे हैं कि उन्हें पुरोहितों में बृहस्पति, सेनानियों में स्कन्द (कार्तिकेय) और जलाशयों में समुद्र के समान मानना चाहिए। यहाँ भगवान अपनी व्यापकता और नेतृत्व के स्वरूप को बता रहे हैं। उन्होंने यहाँ अपने जीवन के विभिन्न पहलुओं को एक उदाहरण के रूप में पेश किया है ताकि अर्जुन और हम सभी इससे एक महान शिक्षा प्राप्त कर सकें। इस श्लोक का मुख्य संदेश यह है कि ईश्वर हर वस्तु में व्याप्त है और नेतृत्व के संदर्भ में भी उनका वास होता है। भगवान कृष्ण इस श्लोक के माध्यम से हमें यह बताना चाहते हैं कि हमें समस्त प्राणियों में एकता और समर्पण की भावना रखनी चाहिए और सभी को समान दृष्टि से देखना चाहिए। इस श्लोक के माध्यम से हमें यह भी सिखाया जाता है कि हमें समस्त जीवों में भगवान की पहचान करनी चाहिए और उनकी सेवा में निरंतर लगन और प्रेम रखना चाहिए। इससे हम न केवल अपने आत्मिक विकास में सहायता प्राप्त कर सकते हैं बल्कि