अश्वत्थः सर्ववृक्षाणां देवर्षीणां च नारदः। गन्धर्वाणां चित्ररथः सिद्धानां कपिलो मुनिः॥26॥
Translation (HI)
वृक्षों में मैं अश्वत्थ (पीपल) हूँ, देवर्षियों में नारद, गंधर्वों में चित्ररथ और सिद्धों में कपिल मुनि हूँ।
Life Lesson (HI)
ईश्वर विविध रूपों में सुगंध, संगीत, और ज्ञान के रूप में हैं।
Commentary (HI)
इस श्लोक में भगवान कृष्ण अपने विभिन्न रूपों का वर्णन कर रहे हैं। उन्होंने कहा है कि वृक्षों के राजा अश्वत्थ हूँ, देवर्षियों में मैं नारद हूँ, गंधर्वों के राजा चित्ररथ हूँ और सिद्ध पुरुषों में कपिल मुनि हूँ।
इस भावार्थ में यह सार्थक है कि भगवान कृष्ण सभी प्राणियों में स्थित हैं और उनका व्यापक स्वरूप अनंत है। उनका रूप अत्यन्त अद्भुत और अद्वितीय है। इस श्लोक से हमें यह सिखाई जाती है कि भगवान हर जीव के अंतर्यामी हैं और सभी प्राणियों के भीतर उनका वास करता है। इसका अर्थ है कि हमें सभी के प्रति सम्मान, समर्पण और प्रेम रखना चाहिए क्योंकि हर कोई भगवान का रूप है।
इस श्लोक से हमें यह भी सिखाई जाती है कि भगवान के विभिन्न रूपों में उनका स्वरूप अनंत और अद्वितीय है। उनका स्वरूप सुगंध, संगीत और ज्ञान के रूप में व्यक्त होता है जिससे हमें श्रेष्ठता, सौंदर्य और ज्ञान की महत्वता का अनुभव होता है। इसके माध्यम से हमें यह