हे अर्जुन! मैं सृष्टियों का आदि, मध्य और अंत हूँ। विद्याओं में मैं अध्यात्मविद्या हूँ और वादियों में युक्तियुक्त वाद हूँ।
Life Lesson (HI)
ईश्वर समय और ज्ञान के प्रत्येक पहलू में विद्यमान हैं।
Commentary (HI)
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को बता रहे हैं कि वे सृष्टियों का आदि, मध्य और अंत हैं। उन्होंने कहा कि वे विद्याओं में अध्यात्मविद्या हैं और वादियों के बीच युक्तियुक्त वाद करते हैं। इसका मतलब है कि भगवान श्रीकृष्ण सभी जीवों के आध्यात्मिक और बाह्य ज्ञान के स्रोत हैं।
इस श्लोक का मूल अर्थ है कि ईश्वर ही सभी सृष्टियों का आदि, मध्य और अंत हैं और उन्हीं से सभी विद्याएं और युक्तियुक्त वाद उत्पन्न होते हैं। इसके माध्यम से हमें यह ज्ञान मिलता है कि भगवान सर्वशक्तिमान हैं और सभी जीवों के जीवन में उनका महत्वपूर्ण स्थान है।
इस श्लोक से हमें यह सीख मिलती है कि हर चीज में ईश्वर की उपस्थिति है और हमें सभी जीवों के साथ भाईचारा और समानता की भावना रखनी चाहिए। भगवान की अद्वितीयता को समझकर हमें आत्मनिर्भरता और सहनशीलता के साथ जीवन जीना चाहिए।