अक्षराणामकारोऽस्मि द्वन्द्वः सामासिकस्य च। अहमेवाक्षयः कालो धाताऽहं विश्वतोमुखः॥33॥
Translation (HI)
मैं वर्णों में 'अ' हूँ, द्वंद्व समास में द्वंद्व हूँ, अविनाशी काल मैं हूँ, और सृष्टि को धारण करने वाला भी मैं हूँ।
Life Lesson (HI)
संपूर्ण भाषा, काल और क्रिया में ईश्वर की ही शक्ति है।
Commentary (HI)
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अपनी महानता और सर्वशक्तिमानता के बारे में बता रहे हैं। उन्होंने कहा है कि वे सब वर्णों में 'अ' हैं, द्वंद्व समास में द्वंद्व हैं, अविनाशी काल हैं और सृष्टि को धारण करने वाले भी हैं। इसका अर्थ है कि ईश्वर ही सबका कारण और धारक है, और वे सबके नियन्ता और संरक्षक हैं।
यह श्लोक हमें यह बताता है कि सब कुछ ईश्वर की शक्ति से ही संभव है और उसके बिना कुछ भी स्थिर नहीं है। हमें ईश्वर की अद्भुतता और उसकी महानता को समझने की आवश्यकता है और हमें उसके शक्तिशाली होने पर विश्वास रखना चाहिए। इस श्लोक से हमें यह सिखाई जाती है कि हमें ईश्वर में विश्वास रखना चाहिए और उसके प्रति आदर और श्रद्धा दिखानी चाहिए। इससे हमें ईश्वर के प्रति भक्ति और समर्पण की भावना आती है।