Bhagavad Gita • Chapter 11 • Verse 11

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Chapter 11 • Verse 11

Vishvarupa Darshana Yoga

दिव्यमाल्याम्बरधरं दिव्यगन्धानुलेपनम्। सर्वाश्चर्यमयं देवमनन्तं विश्वतोमुखम्॥11॥
Translation (HI)
वह रूप दिव्य मालाओं और वस्त्रों से सुसज्जित था, दिव्य सुगंध से अभिमंत्रित था, सब ओर मुख वाला था और आश्चर्य से परिपूर्ण था।
Life Lesson (HI)
ईश्वर की महिमा हर इन्द्रिय को विस्मित करने वाली होती है।
Commentary (HI)
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण के विराट रूप का वर्णन किया गया है। उनका रूप दिव्य मालाओं और दिव्य वस्त्रों से युक्त है, जिससे वे अत्यधिक सुंदर और आकर्षक लग रहे हैं। उनकी आभा दिव्य सुगंध से युक्त है, जिससे उनकी महिमा और दिव्यता का अनुभव होता है। उनका रूप सर्वत्र मुखवाला है, यानी उनकी दिव्य आकृति सभी दिशाओं में देखने को मिलती है। उनका रूप इतना आश्चर्यजनक है कि इसे देखकर सभी संतुष्ट हो जाते हैं और उनकी अमिट महिमा का अनुभव करते हैं। इस श्लोक से हमें यह सिखाई जाती है कि ईश्वर की महिमा और शक्ति हर इंसान को चकित और आश्चर्यचकित करने में समर्थ है। भगवान की अद्भुतता को समझकर हमें अपने जीवन में सच्चे भक्ति और समर्पण का भाव रखना चाहिए। इससे हमें यह भी समझ मिलता है कि संसार में सभी चीजों का आधार और स्रोत केवल भगवान ही है और हमें उनके प्रति श्रद्धा और भक्ति बनी रखनी चाहिए।