अनेकबाहूदरवक्त्रनेत्रं पश्यामि त्वां सर्वतोऽनन्तरूपम्। नान्तं न मध्यं न पुनस्तवादिं पश्यामि विश्वेश्वर विश्वरूप॥16॥
Translation (HI)
हे विश्वेश्वर! मैं आपको अनेक बाहु, उदर, मुख और नेत्रों वाले, सर्वत्र व्याप्त और अनन्त रूप में देखता हूँ — आपका आदि, मध्य या अंत नहीं देख पा रहा हूँ।
Life Lesson (HI)
ईश्वर अनंत और असीम हैं — उन्हें सीमाओं में नहीं बाँधा जा सकता।
Commentary (HI)
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को अपने दिव्य विश्वरूप का दर्शन करवा रहे हैं। उन्होंने कहा कि वे विश्वरूप में अनेक बाहु, उदर, मुख और नेत्रों वाले हैं, जो कि सर्वत्र व्याप्त और अनन्त हैं। उन्हें देखने पर अर्जुन ने देखा कि भगवान का आदि, मध्य और अंत नहीं है, उन्हें सीमाओं में नहीं बाँधा जा सकता।
इस श्लोक का मुख्य संदेश यह है कि भगवान ईश्वर सभी सीमाओं से परे हैं, उनका रूप अनंत और असीम है। वे सभी जीवों के अंतर्यामी हैं और संसार में सम्पूर्णता के साथ व्याप्त हैं। इस श्लोक से हमें यह समझ मिलता है कि भगवान का साकार और निराकार सबकुछ है और उन्हें समझने के लिए हमें अपनी सीमाओं से परे देखना चाहिए।