भवाप्ययौ हि भूतानां श्रुतौ विस्तरशो मया। त्वत्तः कमलपत्राक्ष माहात्म्यमपि चाव्ययम्॥2॥
Translation (HI)
कमलपत्र नेत्रोंवाले प्रभो! मैंने आपके मुख से भूतों की उत्पत्ति और विनाश तथा आपके अविनाशी ऐश्वर्य को विस्तारपूर्वक सुना।
Life Lesson (HI)
ईश्वर की दिव्यता और विस्तार को जानना आत्मा को स्थिर करता है।
Commentary (HI)
इस श्लोक में श्रीकृष्ण अर्जुन से कह रहे हैं कि उन्होंने अपने मुख से भूतों की उत्पत्ति और विनाश के सम्बंध में विस्तारपूर्वक सुनाया है, और उनके अविनाशी ऐश्वर्य का भी माहात्म्य सुनाया है। इसका अर्थ है कि ईश्वर की अनन्तता, विस्तार और अविनाशिता को समझने से आत्मा को शांति, स्थिरता और समर्पण की प्राप्ति होती है। यह श्लोक हमें यह बताता है कि ईश्वर की महिमा और शक्ति को समझने से हम अपने जीवन में स्थिरता और उदारता का मार्ग चुन सकते हैं।