एवमेतद्यथात्थ त्वमात्मानं परमेश्वर। द्रष्टुमिच्छामि ते रूपमैश्वरं पुरुषोत्तम॥3॥
Translation (HI)
हे परमेश्वर! आपने जैसा कहा, वह सत्य है। अब मैं आपकी ऐश्वर्ययुक्त दिव्य रूप को देखना चाहता हूँ।
Life Lesson (HI)
भक्त ईश्वर को अनुभव करना भी चाहता है, केवल सुनना पर्याप्त नहीं।
Commentary (HI)
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कह रहे हैं कि जैसा तूने कहा है, वह सत्य है। भगवान कह रहे हैं कि अब वह उनके ऐश्वर्ययुक्त दिव्य स्वरूप को देखना चाहते हैं। यहाँ भगवान श्रीकृष्ण अपने विराट स्वरूप का दर्शन करवाने के लिए अर्जुन की प्रार्थना को सुन रहे हैं।
यह श्लोक हमें यह सिखाता है कि भगवान को सिर्फ सुनकर ही नहीं देखकर भी अनुभव करना चाहिए। इससे हमें यह बोध होता है कि भक्त को भगवान के साक्षात्कार की इच्छा होनी चाहिए और उसे उसकी ऐश्वर्ययुक्तता को देखने का अवसर प्राप्त होना चाहिए। इससे हमारे मन में भगवान के प्रति श्रद्धा और भक्ति की भावना उत्पन्न होती है।