दंष्ट्राकरालानि च ते मुखानि दृष्ट्वैव कालानलसन्निभानि। दिशो न जाने न लभे च शर्म प्रसीद देवेश जगन्निवास॥25॥
Translation (HI)
आपके अग्निसमान, भयानक दाढ़ों वाले मुखों को देखकर मैं दिशाओं को नहीं जानता और मुझे सुख नहीं मिल रहा। हे देवों के देव! कृपा कीजिए।
Life Lesson (HI)
जब ईश्वर की शक्ति प्रकट होती है, तब अहंकार विलीन हो जाता है।
Commentary (HI)
इस श्लोक में भगवान कृष्ण अर्जुन को अपने विराट रूप का दर्शन करा रहे हैं। उन्होंने अपने डरावने और भयानक मुख दिखाए, जिनकी तेज आग की तरह थी और जिनकी दृष्टि देखते ही अर्जुन को सुख नहीं मिला। उस समय अर्जुन ने अपने आप को दिशाओं को नहीं जानते हुए पाया और उसे शर्मिंदा महसूस हुआ। इसके बाद वह भगवान से उपाय चाहते हुए उन्हें देवों के देव, जगत के निवासिने और सृष्टि के संभालक कहकर पुकारते हैं।
इस श्लोक में हमें यह सिखाई जाती है कि जब हम ईश्वर की भयंकरता और महानता का अनुभव करते हैं, तो हमारा अहंकार नष्ट हो जाता है और हमें अपने अविश्वास और अज्ञान से मुक्ति मिलती है। इसके माध्यम से हमें यह भी समझाया जाता है कि हमें हमेशा भगवान की कृपा और सहायता की प्रार्थना करनी चाहिए।