नभःस्पृशं दीप्तमनेकवर्णं व्यात्ताननं दीप्तविशालनेत्रम्। दृष्ट्वा हि त्वां प्रव्यथितान्तरात्मा धृतिं न विन्दामि शमं च विष्णो॥24॥
Translation (HI)
हे विष्णु! आकाश को छूने वाले, दीप्तिमान, विविध वर्णों वाले, खुले मुख और प्रज्वलित नेत्रों वाले आपके स्वरूप को देखकर मेरा मन अत्यन्त व्याकुल है, न मुझे धैर्य है, न शांति।
Life Lesson (HI)
ईश्वर की अप्रत्याशित महिमा मन को स्तब्ध कर देती है।
Commentary (HI)
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अपने विराट स्वरूप का वर्णन कर रहे हैं। उन्होंने अर्जुन को अपने विशाल अन्तर्यामी स्वरूप को देखने की अद्वितीय दृष्टि देने के लिए अपने दिव्य दर्शन दिए हैं। भगवान का यह स्वरूप तो इस सांसारिक दृश्य से परे है, इसलिए अर्जुन के मन में भय और अशांति की स्थिति उत्पन्न हो गई। उसके मन में धैर्य की कमी हो गई और उसको शांति की अनुभूति नहीं हो पाई।
भगवान श्रीकृष्ण के इस दर्शन से हमें यह सिखाई जाती है कि ईश्वर की अद्भुत महिमा और दिव्यता के सामने हमारी सामान्य बुद्धि और अनुभव असमर्थ हो जाते हैं। हमें ईश्वर की उच्च महिमा में विश्वास रखना चाहिए और उसकी भक्ति में निरंतर लगे रहना चाहिए। भगवान की भक्ति से ही हमें धैर्य, शांति और उच्च आदर्शों की प्राप्ति होती है।
इस भव्य दर्शन के माध्यम से हमें यह भी समझाया जाता है कि भगवान की अद्वितीय शक्ति और सामर्थ्य के सामने हमारी सभी संकट और चिंताओं का समाधान