वक्त्राणि ते त्वरमाणा विशन्ति दंष्ट्राकरालानि भयानकानि। केचिद्विलग्ना दशनान्तरेषु सन्दृश्यन्ते चूर्णितैरुत्तमाङ्गैः॥27॥
Translation (HI)
वे सब आपके भयावह दाढ़ों वाले मुखों में तेजी से प्रवेश कर रहे हैं, कुछ तो आपके दांतों के बीच फँसे हुए हैं और उनके सिर चूर्ण हो गए हैं।
Life Lesson (HI)
अहंकार और अधर्म अंततः ईश्वर के न्याय में नष्ट होते हैं।
Commentary (HI)
इस श्लोक में भगवान कृष्ण अर्जुन को युद्धभूमि पर द्रष्टि का वर्णन कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि अर्जुन, दुश्मनों के भयावह मुख तेजी से आपकी ओर आ रहे हैं, कुछ दुश्मन आपके दांतों के बीच फंसे हुए हैं और उनके सिर चूर्ण हो गए हैं। यह दृश्य अर्जुन के मन में भय और विस्मय की भावना उत्पन्न करता है।
इस श्लोक का जीवन संदेश है कि अहंकार और अधर्म अंततः नाश की ओर ले जाते हैं। यहाँ भगवान कृष्ण अर्जुन को इस युद्ध में धर्म का पालन करने की प्रेरणा दे रहे हैं, क्योंकि धर्म ही सच्चे जीवन का मार्ग है और अहंकार और अधर्म व्यक्ति को नाश की ओर ले जाते हैं।
इस श्लोक के माध्यम से हमें यह सीख मिलती है कि अधर्म के प्रति आत्मविश्वास और अहंकार से बचना जरूरी है और धर्म के मार्ग पर चलना हमें सच्चे सफलता और खुशियों तक पहुँचा सकता है।