यथा नदीनां बहवोऽम्बुवेगाः समुद्रमेवाभिमुखा द्रवन्ति। तथा तवामी नरलोकवीरा विशन्ति वक्त्राण्यभिविज्वलन्ति॥28॥
Translation (HI)
जैसे नदियाँ अपने वेग के साथ समुद्र की ओर बहती हैं, वैसे ही ये मानव योद्धा आपके प्रज्वलित मुखों में प्रवेश कर रहे हैं।
Life Lesson (HI)
सभी कर्मों का अंतिम लक्ष्य ईश्वर ही होते हैं।
Commentary (HI)
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण ध्यान और समर्पण की महत्ता का महान संदेश दे रहे हैं। यहाँ उन्होंने यह उपमान दिया है कि जैसे नदियाँ अपने वेग के साथ समुद्र की ओर बहती हैं, उसी प्रकार हमारे योद्धा यानी मानव जीवन के योद्धा भगवान के प्रज्वलित मुखों में प्रवेश कर रहे हैं। भगवान के प्रति उनका ध्यान और समर्पण उन्हें उनके लोक की ओर ले जाता है। यह श्लोक इस तत्व को समझाता है कि हमें अपने सभी कर्मों को भगवान के लिए समर्पित करना चाहिए, क्योंकि भगवान ही सभी कर्मों का अंतिम लक्ष्य होते हैं। इस श्लोक के माध्यम से हमें यह शिक्षा मिलती है कि हमें अपने सभी कर्मों को भगवान के प्रति समर्पित करना चाहिए और उनके प्रति श्रद्धा और आस्था रखनी चाहिए। इससे हम अपने जीवन को उच्च उद्देश्य की दिशा में ले जाते हैं और अपने कर्मों से मोक्ष की प्राप्ति के मार्ग पर चलने में सफल होते हैं।