Bhagavad Gita • Chapter 11 • Verse 30

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Chapter 11 • Verse 30

Vishvarupa Darshana Yoga

लेलिह्यसे ग्रसमानः समन्ताल्लोकान्समग्रान्वदनैर्ज्वलद्भिः। तेजोभिरापूर्य जगत्समग्रं भासस्तवोग्राः प्रतपन्ति विष्णो॥30॥
Translation (HI)
आप अपने प्रज्वलित मुखों से सभी दिशाओं से सम्पूर्ण लोकों को निगल रहे हैं। आपके तेज से यह सम्पूर्ण जगत जल रहा है — हे विष्णु!
Life Lesson (HI)
ईश्वर का संहारक रूप भी ब्रह्मांड को प्रभावित करता है।
Commentary (HI)
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अपने विराट स्वरूप की महिमा का वर्णन कर रहे हैं। वे कह रहे हैं कि जैसे सूर्य की भव्यता को देखने के लिए हमें उसकी तेज की ओर देखना पड़ता है, ठीक उसी तरह उनके विराट स्वरूप की भव्यता को देखने के लिए हमें उनके प्रज्वलित मुखों की ओर देखना पड़ता है। उनके तेज से ही सम्पूर्ण जगत जल रहा है, यानी उनकी आज्ञानुसार ब्रह्मांड का संचालन हो रहा है। इस श्लोक से हमें यह सीख मिलती है कि भगवान का विराट स्वरूप अत्यंत भव्य और महान है और उनकी शक्ति अप्रतिम है। हमें इसका सम्मान करना चाहिए और उनकी आज्ञानुसार चलना चाहिए। यह हमें यह भी याद दिलाता है कि ईश्वर सम्पूर्ण ब्रह्मांड का संचालन करते हैं और हमें उनके उपासना और भक्ति में लगना चाहिए।