Bhagavad Gita • Chapter 11 • Verse 43

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Chapter 11 • Verse 43

Vishvarupa Darshana Yoga

पितासि लोकस्य चराचरस्य त्वमस्य पूज्यश्च गुरुर्गरीयान्। न त्वत्समोऽस्त्यभ्यधिकः कुतोऽन्यो लोकत्रयेऽप्यप्रतिमप्रभाव॥43॥
Translation (HI)
आप चर-अचर लोकों के पिता हैं, पूज्य और महान गुरु हैं। तीनों लोकों में आप जैसा कोई नहीं है — न कोई आपकी बराबरी कर सकता है।
Life Lesson (HI)
ईश्वर ही सृष्टि के मूल, मार्गदर्शक और पूज्य हैं।
Commentary (HI)
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को बता रहे हैं कि ईश्वर ही संसार के सभी चर-अचर जीवों के पिता हैं और वे ही पूजनीय और महान गुरु हैं। तीनों लोकों में ईश्वर के समान कोई और नहीं है, और न कोई भी उसके अद्भुत प्रभाव की बराबरी कर सकता है। यह श्लोक हमें यह सिखाता है कि हमें ईश्वर की उन्नति, पूजनीयता और महत्त्व को समझना चाहिए। हमें ईश्वर के प्रति श्रद्धा, आदर और समर्पण रखना चाहिए और उसके मार्गदर्शन में चलना चाहिए। ईश्वर ही हमारे जीवन का आधार हैं और हमें उनके प्रति अत्यंत समर्पण और भक्ति रखनी चाहिए। इस श्लोक से हमें यह भी समझ मिलता है कि ईश्वर के समान कोई भी नहीं है और हमें उनके प्रति अद्भुत समर्पण और आदर रखना चाहिए।