नाहं वेदैर्न तपसा न दानेन न चेज्यया। शक्य एवंविधो द्रष्टुं दृष्टवानसि मां यथा॥53॥
Translation (HI)
न वेदों, न तप, न दान, और न यज्ञ से मैं इस रूप में देखा जा सकता हूँ — जैसा तुमने मुझे देखा।
Life Lesson (HI)
भक्ति और कृपा ही ईश्वर को साक्षात करने के साधन हैं।
Commentary (HI)
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को समझा रहे हैं कि उन्हें उस दिव्य रूप में देखने के लिए न कोई वेदों की ज्ञान की आवश्यकता है, न तप की अध्ययन की, न दान की और न यज्ञ की। भगवान का यह अद्भुत रूप उनकी अपूर्व भक्ति और कृपा के बल पर ही देखा जा सकता है।
भगवान श्रीकृष्ण इस श्लोक के माध्यम से हमें यह सिखाते हैं कि दिव्य रूप की अनुभूति के लिए हमें भगवान की भक्ति में लगना चाहिए और उनकी अनुग्रह की प्रार्थना करनी चाहिए। इस श्लोक से हमें यह समझने को मिलता है कि भक्ति और ईश्वर की कृपा ही उसे साक्षात्कार करने के साधन हैं। इसके बिना कोई भी शास्त्र अथवा धर्म की जानकारी उसे ईश्वर के दिव्य रूप की प्राप्ति में सहायक नहीं हो सकती।
इस श्लोक के माध्यम से हमें यह भी याद दिलाया जाता है कि भगवान की भक्ति में लगने से हमें उनके दिव्य स्वरूप का अनुभव हो सकता है और हम उनकी अनन्त कृपा का भागी हो सकते हैं। इसलिए, इस श्लोक से हमें यह समझने को मिलता ह