Bhagavad Gita • Chapter 12 • Verse 6

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Chapter 12 • Verse 6

Bhakti Yoga

ये तु सर्वाणि कर्माणि मयि संन्यस्य मत्पराः। अनन्येनैव योगेन मां ध्यायन्त उपासते॥6॥
Translation (HI)
जो लोग अपने सभी कर्म मुझमें समर्पित कर मुझे परम मानते हैं, और अनन्य योग से मेरी उपासना करते हैं—
Life Lesson (HI)
अनन्य भक्ति में कर्म और ध्यान दोनों ईश्वर के प्रति समर्पित होते हैं।
Commentary (HI)
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण विविध प्रकार के साधकों के लिए उपयुक्त उपाय का वर्णन कर रहे हैं। उन्होंने कहा है कि जो भक्त अपने सभी कर्मों को भगवान के लिए समर्पित करते हैं और उन्हें समर्पित भाव से उनकी उपासना करते हैं, वे अनन्य योग में स्थित हो जाते हैं। इस श्लोक में यह संदेश दिया गया है कि कर्म और ध्यान दोनों ही ईश्वर के प्रति समर्पित होने चाहिए और यह अनन्य भक्ति का मार्ग है। इससे हमें यह सिखने को मिलता है कि हमें अपने कर्मों को भगवान के सेवा में समर्पित करना चाहिए और उन्हीं के लिए हमें सदैव प्रयासरत रहना चाहिए।