Bhagavad Gita • Chapter 13 • Verse 15

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Chapter 13 • Verse 15

Kshetra–Kshetrajna Vibhaga Yoga

सर्वेन्द्रियगुणाभासं सर्वेन्द्रियविवर्जितम्। असक्तं सर्वभृच्चैव निर्गुणं गुणभोक्तृ च॥15॥
Translation (HI)
वह सभी इन्द्रियों के कार्यों को प्रकाशित करता है, पर स्वयं उनसे रहित है; वह निर्लिप्त है, पर सबका धारक है; गुणों से रहित है, पर उनका भोक्ता है।
Life Lesson (HI)
ईश्वर निष्क्रिय होकर भी सबसे अधिक सक्रिय है।
Commentary (HI)
इस श्लोक में भगवान का स्वरूप विस्तार से वर्णित किया गया है। यह कहता है कि भगवान सभी इन्द्रियों के गुणों को प्रकट करने वाला है, परन्तु वे उन इन्द्रियों से सर्वथा असंबंधित हैं। वे सभी कार्यों से अलग हैं, परन्तु सभी कार्यों का संभालने वाले हैं। भगवान सगुण गुणों से अतीत हैं, परन्तु वे उन गुणों के भोक्ता हैं। इस श्लोक से हमें यह सिखाई जाती है कि ईश्वर का स्वरूप अतीत, निर्गुण और निष्क्रिय है, फिर भी उनका सारा जगत के व्यापारों में साक्षी होना अद्वितीय और अद्भुत है। भगवान का यह स्वरूप हमें उनकी अद्वितीयता और उनके अद्भुत शक्ति का अनुभव कराता है। भगवान के इस स्वरूप को समझकर हमें यह भावना आती है कि हमें उनमें आत्मसात करना चाहिए और उनकी शरण में स्थिर होना चाहिए।