बहिरन्तश्च भूतानामचरं चरमेव च। सूक्ष्मत्वात्तदविज्ञेयं दूरस्थं चान्तिके च तत्॥16॥
Translation (HI)
वह सभी प्राणियों में बाहर और भीतर है, स्थिर और चलायमान है; अत्यंत सूक्ष्म होने से उसे जाना नहीं जा सकता — वह दूर भी है और पास भी।
Life Lesson (HI)
ईश्वर दूर प्रतीत हो सकता है, पर वह हृदय के समीप होता है।
Commentary (HI)
इस श्लोक में भगवद गीता के अध्याय 13 में आत्मा की महत्वपूर्णता का वर्णन किया गया है। यहाँ कहा गया है कि भगवान सभी प्राणियों में बाहर और अंदर हैं, और वे अचल अर्थात स्थिर और गतिशील हैं। उनकी सूक्ष्मता इस कदर महान है कि उसे जानना संभव नहीं है, क्योंकि वे सभी के दूर और निकट हैं। यह श्लोक उन्हें ईश्वर की अनन्तता और सर्वव्यापकता का वर्णन करता है।
इस भावार्थ के माध्यम से हमें यह शिक्षा मिलती है कि ईश्वर हमेशा हमारे साथ है, हमारे हृदय में विराजमान हैं। हमें अपने अंतर्मन को शुद्ध करने के लिए उनकी दिशा में प्रयास करना चाहिए और सभी प्राणियों में उनकी उपस्थिति को महसूस करना चाहिए। इस श्लोक से हमें यह समझने में मदद मिलती है कि ईश्वर की असीम सामर्थ्य और सर्वव्यापकता के आगे हमारी सारी समस्याएँ छोटी हो जाती हैं।