Bhagavad Gita • Chapter 13 • Verse 2

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Chapter 13 • Verse 2

Kshetra–Kshetrajna Vibhaga Yoga

श्रीभगवानुवाच। इदं शरीरं कौन्तेय क्षेत्रमित्यभिधीयते। एतद्यो वेत्ति तं प्राहुः क्षेत्रज्ञ इति तद्विदः॥2॥
Translation (HI)
श्रीभगवान ने कहा: हे कौन्तेय! यह शरीर 'क्षेत्र' कहलाता है और जो इसे जानता है, उसे 'क्षेत्रज्ञ' कहा जाता है — यह ज्ञानी जन कहते हैं।
Life Lesson (HI)
हम शरीर नहीं, अपितु उसके जानने वाले हैं।
Commentary (HI)
इस श्लोक में श्रीकृष्ण भगवान कहते हैं कि शरीर को 'क्षेत्र' और उसे जानने वाले व्यक्ति को 'क्षेत्रज्ञ' कहा जाता है। यहाँ 'क्षेत्र' शरीर का अर्थ है जो एक भौतिक अथवा भावनात्मक रूप है, जिसमें मन, इंद्रियाँ और अहंकार शामिल हैं। जबकि 'क्षेत्रज्ञ' शरीर को जानने वाला व्यक्ति है, जो आत्मा या जीवात्मा के अविकारी स्वरूप को समझता है। इस श्लोक का महत्व है कि हमें अपने असली स्वरूप को समझने की आवश्यकता है। हमारा शरीर तो एक अनित्य और परिवर्तनशील सांसारिक वस्तु है, जबकि हमारी आत्मा अविकारी और अमर है। इसलिए, हमें आत्मा की पहचान कर अपने शरीर के प्रति अभिमान छोड़ना चाहिए और आत्मा में स्थित शांति, सुख और आनंद का आनुभव करना चाहिए। इस श्लोक से हमें यह सिखाई जाती है कि हमारी पहचान शरीर से नहीं, अपितु हमारी आत्मा से होनी चाहिए। हमें शरीर को सिर्फ एक वाहन और आत्मा को हमारी असली पहचान मानना चाहिए। इस प्रकार, हमें आत्मा के अनंत स्वरूप को समझक