तत्क्षेत्रं यच्च यादृक्च यद्विकारि यतश्च यत्। स च यो यत्प्रभावश्च तत्समासेन मे शृणु॥4॥
Translation (HI)
अब तू संक्षेप में मुझसे सुन, वह क्षेत्र (शरीर) क्या है, उसका स्वरूप कैसा है, उसमें क्या-क्या विकार हैं, किस कारण से उत्पन्न होता है और वह क्षेत्रज्ञ कौन है।
Life Lesson (HI)
आध्यात्मिक ज्ञान शरीर और आत्मा के भेद को जानने से शुरू होता है।
Commentary (HI)
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कह रहे हैं कि अब तू मुझसे सुन, क्या है वह क्षेत्र (शरीर), उसकी प्रकृति कैसी है, उसमें कौन-कौन से विकार होते हैं, किस कारण से वह उत्पन्न होता है और वह क्षेत्रज्ञ कौन है।
यहाँ क्षेत्र का अर्थ है शरीर और क्षेत्रज्ञ का अर्थ है आत्मा या जीवात्मा है। भगवान श्रीकृष्ण यहाँ अर्जुन को बता रहे हैं कि आत्मा और शरीर में अंतर होता है और हमें इस अंतर को समझकर आत्मा की प्राप्ति के लिए प्रयत्न करना चाहिए।
इस श्लोक से हमें यह सिखाई जा रही है कि आत्मा और शरीर में भिन्नता है, और हमें इस भेद को समझकर आत्मा के महत्व को समझना चाहिए। आत्मा ही हमारी असली पहचान है, और इस पहचान के माध्यम से हम आत्मा का अद्वितीय स्वरूप समझ सकते हैं और आत्मा के मार्ग पर चलकर आत्मा का साक्षात्कार कर सकते हैं।