Bhagavad Gita • Chapter 13 • Verse 7

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Chapter 13 • Verse 7

Kshetra–Kshetrajna Vibhaga Yoga

इच्छा द्वेषः सुखं दुःखं सङ्घातश्चेतना धृतिः। एतत्क्षेत्रं समासेन सविकारमुदाहृतम्॥7॥
Translation (HI)
इच्छा, द्वेष, सुख, दुख, शरीर का संघटन, चेतना और धैर्य — यह क्षेत्र (शरीर) के विकारों सहित वर्णन किया गया है।
Life Lesson (HI)
चेतना और अनुभव क्षेत्र के ही अंग हैं, आत्मा के नहीं।
Commentary (HI)
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को बता रहे हैं कि शरीर, मन, और इंद्रियों के साथ कैसे इच्छा, द्वेष, सुख, दुःख, चेतना और धैर्य जुड़े हुए हैं। यह सभी प्रकार के विकारों का समावेश करता है जो हमारे शरीर-मन के साथ जुड़े होते हैं। इस श्लोक से हमें यह समझने को मिलता है कि हमारी इच्छाएं, द्वेष, सुख, दुःख और अन्य विकार हमारे शरीर और मन से जुड़े हुए हैं, जो क्षेत्र के रूप में जाना जाता है। अत: हमें इन विकारों को संयमित रखकर अपने आत्मा की साक्षात्कार की दिशा में अग्रसर होना चाहिए। इस भावार्थ के माध्यम से हमें यह समझने को मिलता है कि हमारे आत्मा को शरीर और मन से अलग मानकर हमें इन विकारों से परे जानना चाहिए। जब हम इन विकारों का सामना करते हैं और उन्हें संयमित रखते हैं, तो हमारा आत्मा स्वतः ही प्रकट होता है और हमें आत्मा की अद्वितीयता का अनुभव होता है। इस श्लोक से हमें यह समझने को मिलता है कि आत्मा अनंत, निर्मल और अमर है, जबकि शरीर