हे भरतश्रेष्ठ! लोभ, अत्यधिक गतिविधि, कर्मों की शुरुआत, असंयम और इच्छाएं — ये सब रजोगुण की वृद्धि के लक्षण हैं।
Life Lesson (HI)
रजोगुण की प्रधानता चंचलता और लोभ को बढ़ाती है।
Commentary (HI)
इस श्लोक में भगवान कृष्ण अर्जुन से कह रहे हैं कि लोभ, अत्यधिक क्रियात्मकता, कर्मों की शुरुआत, असंयम और इच्छाएं — ये सब रजोगुण की वृद्धि के लक्षण हैं। रजोगुण जो गुण अज्ञान और अधर्म के साथ जुड़ा होता है, यह चंचलता, उत्साह और भोगों की आकांक्षाओं को बढ़ाता है। इस गुण के प्रभाव से व्यक्ति कर्मों में आसक्ति और लोभ में फंस जाता है, जिससे उसका बुद्धि विक्षिप्त हो जाता है।
इस श्लोक से हमें यह शिक्षा मिलती है कि रजोगुण के प्रभाव से हमें अपने कर्मों में संतुलितता, अध्ययन और संयम की आवश्यकता है। हमें अपने इच्छाओं और लोभ को नियंत्रित करना चाहिए ताकि हम सही दिशा में अपनी प्रगति कर सकें और अध्ययन के माध्यम से स्वयं को उन्नत कर सकें। यह श्लोक हमें यह बताता है कि हमें जीवन में संतुलन और सजीवता के साथ कर्म करना चाहिए ताकि हम समृद्धि और सफलता की ओर अग्रसर हो सकें।