सत्कर्मों का फल सात्त्विक और निर्मल होता है; रजोगुण का फल दुःख होता है और तमोगुण का फल अज्ञान।
Life Lesson (HI)
कर्म के फल का स्वरूप उसके पीछे के गुण पर निर्भर करता है।
Commentary (HI)
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को गुणों के अनुसार कर्मों के फल के विषय में बताते हैं। यहाँ तीन प्रकार के गुणों के आधार पर कर्मों के फलों की व्याख्या की गई है।
1. सात्त्विक गुण के अनुसार किए गए सत्कर्मों का फल सुकृत और निर्मल होता है। यह कर्म जो सत्व गुण से युक्त होता है, उसका फल प्रसन्नता, शांति और आनंद से भरा होता है।
2. रजोगुण के अनुसार किए गए कर्मों का फल दुःखमय होता है। यह कर्म जो रजोगुण से प्रेरित होता है, उसका फल असन्तुष्टि, अशांति और दुःखपूर्ण होता है।
3. तमोगुण के अनुसार किए गए कर्मों का फल अज्ञान होता है। यह कर्म जो तमोगुण से युक्त होता है, उसका फल अज्ञान, मोह और अंधकार होता है।
इस श्लोक से हमें यह समझ मिलता है कि हमारे कर्मों के फल का स्वरूप हमारे गुणों पर निर्भर करता है। हमें सात्त्विक गुण की संगति में रहकर सत्कर्म करने का प्रयास करना चाहिए ताकि हम शुद्धता, सुख और आनंद को प्राप्त कर सकें।