Bhagavad Gita • Chapter 16 • Verse 16

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Chapter 16 • Verse 16

Daivasura Sampad Vibhaga Yoga

अनेकचित्तविभ्रान्ता मोहजालसमावृताः। प्रसक्ता कामभोगेषु पतन्ति नरकेऽशुचौ॥16॥
Translation (HI)
अनेक विचारों से भ्रमित, मोहजाल में फँसे और भोगों में लिप्त होकर, वे गंदे नरक में गिरते हैं।
Life Lesson (HI)
चिन्ताएं और वासनाएं नरक का मार्ग बनाती हैं।
Commentary (HI)
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण भक्ति और अध्यात्म के महत्व को बताते हैं। यहाँ उन्होंने स्पष्ट किया है कि जो व्यक्ति अपने विचारों के अनेकता में भ्रमित होकर मोहजाल में फँस जाते हैं और अपनी इंद्रियों के भोगों में लिप्त हो जाते हैं, वे अशुचि या गंदे नरक में गिरते हैं। इस श्लोक का जीवन संदेश है कि चिंताएं और वासनाएं हमें अपने लक्ष्य से दूर कर देती हैं और हमें नरक की ओर ले जाती हैं। यह हमें यह शिक्षा देता है कि हमें अपने मन को शुद्ध रखना और अपने भावनाओं को नियंत्रित करना चाहिए ताकि हम सच्चे और प्रामाणिक जीवन जी सकें। इसका सार है कि अपने मन को निगल लेने के बजाय उसे नियंत्रित करें और ध्यान दें ताकि हम सही मार्ग पर चल सकें।