Bhagavad Gita • Chapter 16 • Verse 15

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Chapter 16 • Verse 15

Daivasura Sampad Vibhaga Yoga

आढ्योऽभिजनवानस्मि कोऽन्योऽस्ति सदृशो मया। यक्ष्ये दास्यामि मोदिष्य इत्यज्ञानविमोहिताः॥15॥
Translation (HI)
‘मैं धनवान और कुलीन हूँ, मुझ जैसा कौन है? मैं यज्ञ करूँगा, दान दूँगा और आनन्द लूँगा।’ — इस प्रकार वे अज्ञान से मोहित होते हैं।
Life Lesson (HI)
अज्ञान आत्ममोह और बाह्य प्रदर्शन का मूल है।
Commentary (HI)
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को बता रहे हैं कि वे अज्ञान से मोहित होकर अहंकार में अपनी महिमा को लेकर गर्वित हो रहे हैं। यह एक भ्रांति और अहंकार की स्थिति है जो उन्हें ये मानने पर मजबूर कर रही है कि कोई उनके समान नहीं है और उनके साथ तुलनात्मक रूप से बराबर नहीं है। भगवान श्रीकृष्ण इस श्लोक में इस भ्रांति को दूर करने के लिए उन्हें समझाते हैं कि एक व्यक्ति की महिमा उसके भाग्य या समर्पण से नहीं, बल्कि उसके अच्छे कर्मों और धर्मपरायण जीवन से होती है। एक व्यक्ति को अपने आप को धनवान और कुलीन समझने की बजाय वह यज्ञ करने, दान देने और आनंद लेने के लिए समर्पित होना चाहिए। इस श्लोक का मुख्य संदेश है कि अज्ञान, आत्ममोह और बाह्य प्रदर्शन का मूल है। अज्ञान से मोहित होकर व्यक्ति अपने अहंकार में प्रवृत्त होता है और अपने असली धर्म और जीवन का उद्देश्य भूल जाता है। इसलिए, हमें अपने अहंकार को छोड़कर सच्चे धर्म और सेवा में समर