इस संसार में दो प्रकार के प्राणी उत्पन्न होते हैं — दैवी और आसुरी। दैवी स्वभाव का वर्णन विस्तार से हुआ; अब हे पार्थ! आसुरी स्वभाव को मुझसे सुनो।
Life Lesson (HI)
मनुष्य को दोनों प्रवृत्तियों की पहचान होनी चाहिए।
Commentary (HI)
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कह रहे हैं कि इस संसार में दो प्रकार के प्राणी उत्पन्न होते हैं - एक दैवी प्रकृति वाले और दूसरे आसुरी प्रकृति वाले। दैवी स्वभाव वालों का वर्णन विस्तार से किया गया है, जिससे स्पष्ट होता है कि वे कैसे जीते हैं और कैसे काम करते हैं। अब हे अर्जुन! मैं तुझसे आसुरी स्वभाव वालों का वर्णन करता हूँ, ताकि तू उन्हें पहचान सके।
इस श्लोक का मुख्य संदेश यह है कि मनुष्य को दोनों प्रकार की प्रवृत्तियों की पहचान करनी चाहिए। दैवी प्रवृत्ति वाले लोग ज्ञान, विवेक, दया, सहानुभूति और निस्वार्थता के साथ कार्य करते हैं, जबकि आसुरी प्रवृत्ति वाले लोग अहंकार, क्रोध, लोभ, मोह और अनैतिकता में रत रहते हैं। इसलिए, हमें सावधान रहकर अपनी प्रवृत्ति को पहचानना और उसके अनुसार कर्म करना चाहिए।