प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च जना न विदुरासुराः। न शौचं नापि चाचारो न सत्यं तेषु विद्यते॥7॥
Translation (HI)
आसुरी प्रवृत्ति वाले लोग प्रवृत्ति और निवृत्ति (कर्तव्य और अकर्तव्य) को नहीं जानते, उनमें न शुद्धता होती है, न आचरण और न ही सत्य।
Life Lesson (HI)
बिना धर्मबोध के जीवन केवल अज्ञान और विनाश की ओर ले जाता है।
Commentary (HI)
यह श्लोक भगवद गीता के आध्यात्मिक ग्रंथ में स्थित है और इसमें आसुरी प्रवृत्ति वाले लोगों की विशेषताओं का वर्णन किया गया है। इस श्लोक में आसुरी प्रवृत्ति वाले लोगों की अवस्था का विवरण दिया गया है। इन लोगों को कर्तव्य और अकर्तव्य की समझ नहीं होती, उनके शौच, आचरण और सत्य को संबोधित करते हुए कहा गया है कि इन गुणों में उनकी अभाव होती है।
इस श्लोक का मुख्य संदेश है कि जो व्यक्ति धर्म की समझ और अनुसरण नहीं करता, उसका जीवन सत्ता की ओर नहीं बल्कि अज्ञान और विनाश की ओर बढ़ता है। यह श्लोक हमें यह शिक्षा देता है कि धर्म के मार्ग पर चलना हमारे जीवन को संतुलित और सफल बनाता है जबकि धर्म से विचलित होना हमें अंधकार और अज्ञान की ओर ले जाता है।
इस श्लोक के माध्यम से हमें यह भी समझ मिलता है कि अज्ञानता और धर्महीनता का परिणाम हमारे जीवन में अन्याय, अस्तित्व की अवगाहना और संघर्ष के रूप में दिखाई देता है। इसलिए, हमें धर्म