देवद्विजगुरुप्राज्ञपूजनं शौचमार्जवम्। ब्रह्मचर्यमहिंसा च शारीरं तप उच्यते॥14॥
Translation (HI)
देवता, ब्राह्मण, गुरु और ज्ञानियों की पूजा, पवित्रता, सरलता, ब्रह्मचर्य और अहिंसा — ये शारीरिक तप कहलाते हैं।
Life Lesson (HI)
शरीर का संयम आत्मा की साधना में सहायक है।
Commentary (HI)
इस श्लोक में भगवान कृष्ण धर्म के विविध पहलुओं की महत्वपूर्णता पर विचार कराते हैं। यहाँ पाँच प्रमुख तप के विषयों का उल्लेख किया गया है: देवता की पूजा, ब्राह्मणों की सेवा, गुरु की प्रशंसा, ज्ञानियों के सम्मान करना, पवित्रता, सरलता, ब्रह्मचर्य और अहिंसा। ये सभी गुण एक स्वस्थ और सफल जीवन के लिए आवश्यक हैं।
देवता, ब्राह्मण, गुरु और ज्ञानियों की पूजा करना हमें संगीत और आदर्श देता है। पवित्रता हमें अपने शरीर और मन को शुद्ध रखने के मार्ग को दिखाती है। सरलता हमें निर्भेद और सहज रहने की शिक्षा देती है। ब्रह्मचर्य हमें अपनी इंद्रियों को नियंत्रित करने और अध्ययन में समर्पित रहने की शक्ति प्रदान करती है। अहिंसा हमें हिंसा से दूर रहने और सभी प्राणियों के प्रति दयालु और समझदार बनने की शिक्षा देती है।
इस श्लोक का मुख्य संदेश है कि शरीर का संयम और उस पर विचार करना आत्मा की साधना में महत्वपूर्ण है। यह हमें अपनी इंद्रियों को नियंत्रित करने