दातव्यमिति यद्दानं दीयतेऽनुपकारिणे। देशे काले च पात्रे च तद्दानं सात्त्विकं स्मृतम्॥20॥
Translation (HI)
जो दान 'देना चाहिए' यह सोचकर बिना किसी प्रत्युपकार की इच्छा से उचित स्थान, समय और पात्र को दिया जाता है — वह सात्त्विक दान कहलाता है।
Life Lesson (HI)
सात्त्विक दान आत्मा को शुद्ध और प्रसन्न करता है।
Commentary (HI)
इस श्लोक में श्रीकृष्ण भगवान भगवद गीता में दान के विभिन्न प्रकारों की महत्ता को समझाते हैं। यहाँ सात्त्विक दान का वर्णन किया गया है, जो उचित स्थान, समय और पात्र के अनुसार दिया जाता है और जिसमें कोई प्रत्युपकार की अपेक्षा नहीं होती।
सात्त्विक दान वह है जो निःस्वार्थ होता है और जिसमें देने वाले की केवल उत्तम भावना होती है। इसमें कोई भी स्वार्थ या प्रत्युपकार की उम्मीद नहीं होती। यह दान आत्मा को शुद्ध और प्रसन्न करता है और उसके द्वारा देने वाले का भी आत्मा शुद्ध हो जाता है।
इस श्लोक से हमें यह सिखाई जाती है कि दान का महत्व सिर्फ उसकी मात्रा या प्रकार में नहीं होता, बल्कि उसकी भावना और उद्देश्य में होता है। सात्त्विक दान जीवन में सकारात्मकता और उच्चता लाता है और हमें आत्मा की शुद्धि की दिशा में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करता है।