यत्तु प्रत्युपकारार्थं फलमुद्दिश्य वा पुनः। दीयते च परिक्लिष्टं तद्दानं राजसं स्मृतम्॥21॥
Translation (HI)
जो दान प्रत्युपकार की आशा से या फल की दृष्टि से किया जाता है और जो कष्टपूर्वक दिया जाता है — वह राजस दान कहलाता है।
Life Lesson (HI)
स्वार्थ या अनिच्छा से दिया गया दान शुद्ध नहीं होता।
Commentary (HI)
इस श्लोक में भगवान कृष्ण भागवत गीता में दान के तीन प्रकारों का वर्णन कर रहे हैं। राजस दान का वर्णन करते हुए उन्होंने कहा है कि जब कोई दान प्रत्युपकार की आशा से या फल की दृष्टि से किया जाता है और उसे कष्टपूर्वक देना पड़ता है, तो वह दान राजस या तामसिक माना जाता है।
भगवान कृष्ण इस श्लोक में हमें यह शिक्षा देने का प्रयास कर रहे हैं कि हमें दान करते समय स्वार्थ या अनिच्छा से नहीं, बल्कि सात्विक भावना और सच्चे हृदय से करना चाहिए। सात्विक दान जो किसी के लाभ के लिए बिना किसी उम्मीद या फल की चाहत के किया जाता है, वह सबसे उच्च और पवित्र माना जाता है। इस प्रकार का दान समाज में समर्पण और प्रेम को बढ़ावा देता है और साथ ही दान करने वाले को आनंद और शांति का अनुभव कराता है।