यस्यानाहंकृतो भावो बुद्धिर्यस्य न लिप्यते। हत्वाऽपि स इमाँल्लोकान्न हन्ति न निबध्यते॥17॥
Translation (HI)
जिसके भीतर अहंकार नहीं है, और जिसकी बुद्धि कर्म से लिप्त नहीं होती — वह भले ही सबको मार डाले, फिर भी वह न हत्यारा होता है, न बंधन में पड़ता है।
Life Lesson (HI)
कर्म बंधन में नहीं बांधता, मोह और अहंकार बांधते हैं।
Commentary (HI)
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण गीता में ज्ञानी पुरुष की महिमा का वर्णन कर रहे हैं। यहां कहा गया है कि जिस व्यक्ति के भीतर अहंकार की भावना नहीं है, और जिसकी बुद्धि कर्म से लिप्त नहीं होती, वह वास्तव में महान है। ऐसा व्यक्ति चाहे वह सभी को मार डाले, फिर भी वह न हिंसक होता है और न बंधन में फंसता है।
इस श्लोक से हमें यह सिखाई जाती है कि कर्म बंधन में हमें पिरोने की आदत नहीं होनी चाहिए। अहंकार और मोह हमें बंधन में डालकर हमें अपने कर्मों से जुड़ देते हैं। इसलिए, हमें अपने कर्मों को आत्मसाक्षात्कार के माध्यम से न केवल एक कार्य मानना चाहिए, बल्कि उनसे अहंकार और मोह को दूर करने का एक माध्यम मानना चाहिए।
इस श्लोक से हमें यह सिखाई जाती है कि आत्मसमर्पण और निष्काम कर्म केवल जीवन को समृद्ध बनाने में मदद करते हैं, बल्कि वे हमें अहंकार और मोह से मुक्ति प्राप्त करने में भी सहायक होते हैं। इसी तरह, इस श्लोक का सार्थक अर्थ है कि हमें अहंकार और मोह को त्यागक