Bhagavad Gita • Chapter 18 • Verse 16

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Chapter 18 • Verse 16

Moksha Sannyasa Yoga

तत्रैवं सति कर्तारमात्मानं केवलं तु यः। पश्यत्यकृतबुद्धित्वान्न स पश्यति दुर्मतिः॥16॥
Translation (HI)
इस प्रकार यदि कोई व्यक्ति कर्म के इन कारणों को न जानकर आत्मा को ही एकमात्र कर्ता मानता है, तो वह मिथ्या बुद्धि वाला है और सच्चाई को नहीं देखता।
Life Lesson (HI)
कर्तापन का अहंकार अज्ञान का लक्षण है।
Commentary (HI)
इस श्लोक में भगवान कृष्ण अहंकार के विषय में बता रहे हैं। एक व्यक्ति जो कर्म करते समय अपने आत्मा को ही कर्ता मानता है, अर्थात् अपने को कर्म करने वाला समझता है, वह व्यक्ति अंधविश्वास और अज्ञान में है। ऐसा व्यक्ति असलीता को नहीं समझता है, उसकी बुद्धि मिथ्या होती है और वह सच्चाई को नहीं देख पाता। इस श्लोक से हमें यह सिखाई जाती है कि हमें अहंकार में न रहकर सच्चाई को समझना चाहिए। हमें यह समझना चाहिए कि हम सच्चाई में केवल एक अंश हैं और सभी कर्म भगवान की इच्छा अनुसार होते हैं। अहंकार को छोड़कर हमें सच्चाई को समझना चाहिए और हमें सच्चाई के प्रति समर्पित होकर कर्म करना चाहिए। इस भव्य भगवद गीता श्लोक से हमें यह समझने को मिलता है कि अहंकार और अज्ञान ही हमारे जीवन के विभिन्न संकटों का मूल है। इसलिए, हमें अहंकार को दूर करके अपनी बुद्धि को समझदार और सच्चाई के प्रति उत्साही बनना चाहिए।