जो कर्म नियत, आसक्ति और राग-द्वेष से रहित होकर केवल कर्तव्य समझकर और फल की इच्छा के बिना किया जाए — वह सात्त्विक कर्म है।
Life Lesson (HI)
कर्तव्य भावना से किया गया निष्काम कर्म ही सबसे श्रेष्ठ है।
Commentary (HI)
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण गीता में विभिन्न प्रकार के कर्मों का वर्णन कर रहे हैं। यहाँ उन्होंने सात्त्विक कर्म के विषय में बताया है। सात्त्विक कर्म वह है जो नियत, आसक्ति और राग-द्वेष से रहित होता है और सिर्फ कर्तव्य के पालन में होता है। इसमें फल की इच्छा नहीं होती है।
इस श्लोक के माध्यम से हमें यह सिखाया जाता है कि हमें कर्म करते समय आसक्ति और राग-द्वेष से परे रहना चाहिए और केवल कर्तव्य के पालन में निरंतरता बनाए रखनी चाहिए। इस तरह का कर्म हमें आत्मसमर्पण और उदारता की भावना से भर देता है और हमें आत्मिक उन्नति की दिशा में आगे बढ़ने में मदद करता है।