अनुबन्धं क्षयं हिंसामनपेक्ष्य च पौरुषम्। मोहादारभ्यते कर्म यत्तत्तामसमुच्यते॥25॥
Translation (HI)
जो कर्म परिणाम, हानि, हिंसा और सामर्थ्य की परवाह किए बिना अज्ञानवश किया जाता है — वह तामस कर्म कहलाता है।
Life Lesson (HI)
सोचे बिना किया गया कर्म दूसरों के साथ स्वयं को भी हानि पहुँचाता है।
Commentary (HI)
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण तामस कर्म की विशेषताओं का वर्णन कर रहे हैं। तामस कर्म वह कर्म है जो अज्ञान और मोह से होता है, जिसमें कर्म का परिणाम, हानि और हिंसा की परवाह नहीं होती और सामर्थ्य का ध्यान नहीं रखा जाता। इस प्रकार का कर्म संसार में अज्ञान और अधर्म की वृद्धि करता है।
भगवान श्रीकृष्ण सार्थक कर्म का महत्व बताते हैं और समझाते हैं कि सोचे बिना और अज्ञानवश किए गए कर्म दूसरों को हानि पहुंचाने के साथ-साथ अपने आप को भी उत्पीड़ित करता है। इसलिए हमें समझना चाहिए कि समर्थ कर्म करना और उसके परिणामों की परवाह करना हमारे उत्तम भविष्य के लिए आवश्यक है।