जो व्यक्ति आसक्ति और अहंकार से मुक्त हो, धैर्य और उत्साह से युक्त हो, तथा सफलता और असफलता में समभाव रखता हो — वह सात्त्विक कर्ता कहलाता है।
Life Lesson (HI)
सफलता या विफलता से प्रभावित न होना ही संतुलन की निशानी है।
Commentary (HI)
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण भगवान भीष्म को उत्तरित कर रहे हैं। यहाँ वर्णित किया गया है कि एक सात्त्विक कर्ता वह होता है जो आसक्ति और अहंकार से मुक्त है, धैर्य और उत्साह से युक्त है, और सफलता और असफलता के परिणामों में समानभाव रखता है। इस श्लोक से हमें यह सीख मिलती है कि हमें सफलता या असफलता से प्रभावित नहीं होना चाहिए। जो व्यक्ति संतुलन और समभाव से जीवन जीता है, वह सात्त्विक कर्ता कहलाता है। इस श्लोक से हमें यह भी सीख मिलती है कि हमें अपने कर्मों में आसक्ति और अहंकार से दूर रहना चाहिए और सफलता और असफलता को समान दृष्टिकोण से देखना चाहिए।