सुखं त्विदानीं त्रिविधं शृणु मे भरतर्षभ। अभ्यासाद्रमते यत्र दुःखान्तं च निगच्छति॥36॥
Translation (HI)
हे भरतश्रेष्ठ! अब मेरे से सुख के तीन प्रकारों को सुनो, जिसमें अभ्यास के द्वारा मन रमने लगता है और जो दुःख के अंत को लाता है।
Life Lesson (HI)
सच्चा सुख वह है जो अभ्यास से आता है और दुख को दूर करता है।
Commentary (HI)
इस श्लोक में भगवद गीता में सुख के तीन प्रकारों के विवरण किया गया है। यहाँ कहा गया है कि सुख के तीन प्रकार हैं - अभ्यास से मन का रमण, दुःख का अन्त और दुःख से मुक्ति।
भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कह रहे हैं कि सच्चा सुख वह है जो अभ्यास से प्राप्त होता है। जब हम किसी चीज को नियमित रूप से करते हैं, उसमें लगे रहते हैं, तो हमारा मन उसमें रमने लगता है। यह अभ्यास हमें सुख और संतोष की अनुभूति कराता है।
इसके अलावा, अभ्यास से हम दुःख के अंत को भी प्राप्त कर सकते हैं। जब हम अपने मन को नियंत्रित करने का अभ्यास करते हैं, तो हम अपने अंतर के दुःख से मुक्ति प्राप्त कर सकते हैं।
इस श्लोक से हमें यह सिखाई गई है कि सुख को पाने के लिए अभ्यास और साधना की आवश्यकता होती है। जब हम निरंतर प्रयत्न करते रहते हैं और अपने मन को नियंत्रित करते हैं, तो हम सच्चे सुख का अनुभव कर सकते हैं और दुःख से मुक्ति प्राप्त कर सकते हैं। इसी तरह सुख के अंतर्मुखी अभ्यास