Bhagavad Gita • Chapter 18 • Verse 35

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Chapter 18 • Verse 35

Moksha Sannyasa Yoga

यया स्वप्नं भयं शोचं विषादं मदमेव च। न विमुञ्चति दुर्मेधा धृतिः सा पार्थ तामसी॥35॥
Translation (HI)
हे पार्थ! जो बुद्धिहीन धृति स्वप्न, भय, शोक, विषाद और मद को नहीं त्यागती — वह तामसी धृति कहलाती है।
Life Lesson (HI)
असत्य, डर और मोह में डटी हुई संकल्पशक्ति आत्मघाती है।
Commentary (HI)
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कह रहे हैं कि जो धृति या संकल्पशक्ति असत्य, भय, शोक, विषाद और अहंकार को नहीं छोड़ती है, वह धृति तामसी मानी जाती है। यह धृति बुद्धिहीन और अज्ञानी लोगों की होती है जो अपने स्वप्नों में लिप्त रहते हैं और भय, शोक और मोह में उलझे रहते हैं। इस श्लोक का संदेश है कि हमें सत्य और अज्ञान का विवेक करना चाहिए और असत्य और अज्ञान से दूर रहकर सही दिशा में अपने कार्यों को करना चाहिए। असत्य, डर और मोह में उलझकर हम अपने आप को हानि पहुंचाते हैं। इसलिए, जीवन में सफलता प्राप्त करने के लिए हमें सत्य और ज्ञान की ओर अपनी ध्यान केंद्रित करना चाहिए।