Bhagavad Gita • Chapter 18 • Verse 52

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Chapter 18 • Verse 52

Moksha Sannyasa Yoga

विविक्तसेवी लघ्वाशी यतवाक्कायमानसः। ध्यानयोगपरो नित्यं वैराग्यं समुपाश्रितः॥52॥
Translation (HI)
एकांत में रहने वाला, अल्प भोजन करने वाला, वाणी, शरीर और मन को नियंत्रित रखने वाला, ध्यानयोग में नित्य तत्पर, और वैराग्य को अपनाने वाला…
Life Lesson (HI)
साधना में स्थिरता और वैराग्य ही आत्मज्ञान की ओर ले जाते हैं।
Commentary (HI)
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को एक साधक के गुणों का वर्णन कर रहे हैं। एक साधक को चाहिए कि वह एकांत में रहे, अर्थात् अकेले होकर ध्यान में लगे रहें। अल्प भोजन करने वाला हो, जिससे उसका मन और शरीर परिश्रमित न लगे। उसकी वाणी, शरीर और मन को नियंत्रित रखना चाहिए, अर्थात् उन्हें संयमित रखना चाहिए। वह ध्यानयोग में नित्य तत्पर रहे, अर्थात् उसका मन सदा ध्यान में लगा रहे। और वह वैराग्य को अपनाए, अर्थात् उसका मन संसारिक भोगों में आसक्त न रहे, वैराग्य और विरक्ति का आदर्श बनाए रखे। इस श्लोक का जीवन संदेश है कि साधना में स्थिरता और वैराग्य ही आत्मज्ञान की ओर ले जाते हैं। एक साधक को इन गुणों को अपनाकर आत्मा की अध्ययन और साधना में सफलता प्राप्त करने की दिशा में अग्रसर होना चाहिए। यह गुण साधना के माध्यम से मन की शुद्धि और आत्मा के प्रकाश की दिशा में मदद करते हैं। इस श्लोक से हमें यह समझ मिलता है कि साधना में स्थिरता और वैराग्य की