यदि अहंकारं आश्रित्य न योत्स्य इति मन्यसे। मिथ्यैष व्यवसायस्ते प्रकृतिस्त्वां नियोक्ष्यति॥59॥
Translation (HI)
यदि तुम अहंकारवश यह सोचो कि ‘मैं युद्ध नहीं करूंगा’, तो यह तुम्हारा व्यर्थ निश्चय है; प्रकृति तुम्हें तुम्हारे स्वभाव के अनुसार ही प्रवृत्त कर देगी।
Life Lesson (HI)
प्रकृति के स्वभाव से कोई बच नहीं सकता।
Commentary (HI)
इस श्लोक में भगवान कृष्ण अर्जुन से कह रहे हैं कि अगर तुम अहंकार के वश में होकर यह मानते हो कि 'मैं युद्ध नहीं करूंगा', तो यह तुम्हारा मिथ्या और व्यर्थ निश्चय है। अगर तुम अपने स्वभाव के अनुसार व्यवहार करने से बाज नहीं आते हो, तो प्रकृति तुम्हें उसी दिशा में प्रेरित करेगी।
इस श्लोक का मुख्य संदेश है कि हमें अपने अहंकार और स्वभाव से परे उचित कर्म करने की दिशा में चलना चाहिए। प्रकृति की शक्ति हमें हमारे स्वभाव के अनुसार प्रेरित करती है, और हमें उसे समझकर उचित कर्म करना चाहिए। अहंकार और मिथ्या भावनाएं हमें गलत दिशा में ले जाती हैं, जबकि सही दिशा में चलने पर हम प्रकृति के साथ समर्थ होते हैं।
इस भावार्थ के माध्यम से हमें यह समझने को मिलता है कि हमें अपने अहंकार को छोड़कर अपने स्वभाव के अनुसार उचित कर्म करने की दिशा में चलना चाहिए। इससे हम सही दिशा में आगे बढ़ सकते हैं और सही कार्य कर सकते हैं।