हे कौन्तेय! मोहवश तुम जो कर्म नहीं करना चाहते हो, उसे भी अपने स्वभाव से उत्पन्न कर्म के कारण तुम विवश होकर करोगे।
Life Lesson (HI)
प्रकृति की शक्ति व्यक्ति को उसके कर्म की ओर खींचती है।
Commentary (HI)
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कह रहे हैं कि हे कौन्तेय, तुम्हारे स्वभाव से उत्पन्न कर्म के कारण तुम उस कर्म को करने के लिए विवश हो जाओगे, भले ही तुम उसे करना नहीं चाहते हो। मोह यानी भ्रांति के कारण तुम किसी कर्म को करने से इनकार करते हो, लेकिन प्रकृति की शक्ति तुम्हें उसी कर्म की ओर खींच लेती है और तुम उसे करने के लिए मजबूर हो जाते हो।
यह श्लोक हमें यह सिखाता है कि हमारा स्वभाव हमें हमारे कर्मों की ओर ले जाता है और हम उन कर्मों को करने के लिए बाध्य हो जाते हैं। इसलिए हमें अपने स्वभाव को समझकर उसी के अनुसार कर्म करना चाहिए और मोह या भ्रांति के कारण उन कर्मों से इनकार नहीं करना चाहिए। इससे हम सही दिशा में अपने कर्मों को पूरा कर सकते हैं और जीवन में सफलता प्राप्त कर सकते हैं।