नियत कर्म का संन्यास उचित नहीं है। मोह के कारण किया गया कर्म का त्याग तामस त्याग कहलाता है।
Life Lesson (HI)
मोहवश त्याग अधर्म है, न कि विवेक।
Commentary (HI)
यह श्लोक भगवद गीता के सप्तम अध्याय का सातवां श्लोक है। इस श्लोक के माध्यम से भगवान श्रीकृष्ण जी अर्जुन को बता रहे हैं कि नियत कर्म का संन्यास करना उचित नहीं है। एक व्यक्ति को अपने कर्मों से भाग जाना या उन्हें छोड़ देना सही नहीं है। इसका मुख्य कारण है मोह, यानी अज्ञान और अविवेक।
मोह के कारण अगर कोई व्यक्ति अपने कर्मों का त्याग करता है, तो वह तामसिक त्याग कहलाता है। यह त्याग अधर्मिक होता है क्योंकि यह मोहवश स्थिति का परिणाम है और विवेक के विरुद्ध है। व्यक्ति को अपने कर्मों का सही रूप से समझना चाहिए और उन्हें उचित तरीके से निष्काम भाव से करना चाहिए।
इस श्लोक से हमें यह सिखाई जाती है कि हमें अपने कर्मों से भागने की बजाय उन्हें सही ढंग से निष्काम भाव से करना चाहिए। मोह और अज्ञान के बल पर कर्मों का त्याग करना अधर्मिक है। इसलिए, हमें विवेकपूर्ण तरीके से अपने कर्मों का निष्काम भाव से करना चाहिए ताकि हम सही मार्ग पर चल सकें और अ